बैठी जो जिंदगी का हिसाब करने हर हिसाब उलझ गया,
ना जाने आज क्यों ऐसा लगा की,
शहर - ए - सुकून की चाहत में ,
दिल- ए - आफ़ताब ढल गया।
Baithi jo jindgi ka hisab krne hr hisab ulajh gya,
Na jane aaj kyon esa laga ki,
Sehr-e-sukun ki chaht me,
Dil -e- Aaftab dhal gya.
----- नीतू कुमारी ✍️
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