Thursday, May 28, 2020

हसरत-ए-दिल

हसरत-ए-दिल की अब तो छुपाई नहीं जाती ,
हाल -ए -दिल भी बताई नहीं जाती,
कट जाती है तमाम शब यूं आँखो में ,
कि अब तो पलकें भी झपकाई नहीं जाती।

करवटें बदल-बदल कर परेशान  है हम,
क्योंकि अपनी आहें भी खुद सुनाई नहीं जाती,
लगा कैसा रोग  हमें ,
अब तो यह किसी को बताई भी नहीं जाती।

भूख, प्यास ,नींद, चैन तमाम चीजें ,
अब तो आजमाई नहीं जाती,
आपकी गम-ए-जुदाई में भर आती है आँखें मेरी,
पर अश्क-ए-पैमाना छलकाई भी नहीं जाती।

इस दर्द-ए-रोग की दवा है पास आपके ,
पर आपको यह रोग हमसे दिखाई भी नहीं जाती,
आपकी यादों के गलीफें पर सोते हैं हम ,
पर आपसे तो प्यार की चादर ओढ़ाई भी नहीं जाती।

हसरत-ए-दिल की अब तो छुपाई नहीं जाती ,
हाल -ए -दिल भी बताई नहीं जाती,
है जो इलाज़ मेरे  इस मर्ज़ का पास आपके,
तो इसके इलाज़ में यूं देर लगाई नहीं जाती।
                                             ----- नीतू कुमारी  ✍️





Sunday, May 17, 2020

मजदूर था वो....

मजबूर था वो, क्योंकि मजदूर था वो,
बेबस था वो, लाचार था वो,
अपने हालत का शिकार  था वो,
बस मजबूर था वो, क्योंकि मजदूर था वो।।

थी जद्दोज़ेहद उसे  ....
दो वक़्त की रोटी कमाने की,
बूढ़े माँ-बाप का सहारा बनने की,
बहन के हाथों में मेहँदी रचाने की,
अपने बच्चों के भविष्य को सवारने की।।

थी मजबूरियाँ उसकी इस कदर,
की जा पहुँचा अपने गाँव से मीलों दूर,
उस अजनबी सपनों के शहर,
जहाँ जगमगाती थी उम्मीदें ,
और चमचमातें थे सपने,
भले उससे दूर हो उसके अपने।।

अचानक वक़्त का पहियाँ घुमा,
सबकुछ एक पल में थम सा गया,
जो कल तक जगमगा रहे थे शहर,
आज वही सन्नाटा सा पसर गया।।

एक बार फिर  ....
वो मजदूर था, जो आज वापस से मजबूर हो गया,
अब सपनों के उस शहर में ,
जीना उसका मुहाल हो गया,
वापस से अपने गाँव लौटने को,
मजदूर बेहाल हो गया।।

जो भीड़ कल तक गाँव से शहर की ओर आती  ,
आज वो शहर से गाँव  हो गया,
कोई पैदल तो ,कोई साईकिल पर ही सवार हो गया,
कई तो कफ़न में लिपट कर पहुँचे अपने गाँव ,
आज उसका पूरा परिवार ही कंगाल हो गया।।

क्योंकि मजदूर था वो, बस मजबूर था वो ,
हाँ बस मजबूर था वो, क्योंकि मजदूर था वो !!

                                     ----- नीतू कुमारी  ✍️

Wednesday, May 13, 2020

विकार

रमा के हाथ से मोबाइल नीचे गिर पड़ा और वो दीवार से चिपक के सुबकने लगी। दिल तो ज़ोर - ज़ोर से रोने को चाह रहा था पर रमा अपनी सिसकियों को रोकने की  भरपूर कोशिश में थी । अपने हथेलियों से मुँह को दबा रखा था, पर आँखें तो निरंतर बरसात किए जा रही थी। कल ही तो भैया दिल्ली से  बाइपास सर्जरी करवा कर घर लौटे  है । घर में सब यूँ ही भैया की तबीयत को लेकर परेशान है और इस हालत में अपने जज़बात को दबाने की पूरी कोशिश रमा कर रही थी।

 रमा 35 की हो चुकी थी पर अभी तक उसकी शादी नहीं हुई थी  । उससे छोटी दो और बहनें  है -  उमा और जया।  दोनों अपने ससुराल में पति और बच्चों के साथ सुखमय जीवन गुजार रही हैं । रमा का जन्म ही एक विकार के साथ हुआ जो उसकी जिंदगी का ग्रहण बन गया। रमा का एक पैर दूसरे पैर से २ इंच छोटा था पर रमा खेलना , कूदना, सीढियाँ चढ़ना सब कर पाती थी और वो अपने इस विकार साथ खुश थी ।

जब रमा 16 की हुई  तो उसके भैया को किसी ने बताया की ऑपरेशन से रमा का पैर बिलकुल ठीक हो जाएगा । रमा को भी जब ये बात पता चली वो काफी खुश हो गई, कई सपने उसके आँखों के आगे नाचने-झुमने लगे । इंटर का पेपर देने के बाद रमा का पैर का ऑपरेशन हुआ,  एक साल पूरी तरह से उसके बिस्तर पर निकल गए । रमा बहुत खुश थी की अब मैं भी आम लड़कियों की तरह हो जाऊँगी । पर विधाता तो जैसे रमा को उसके विकार के साथ ही देखना चाहते हो , रमा का पैर पहले २ इंच छोटा बड़ा था जो अब ऑपरेशन के बाद १/२ इंच कम ही रह गया और तकलीफ़े पहले से न जाने कितने गुना ज्यादा बढ़ गई ।

अब रमा दवाइयों के कारण  थोड़ी मोटी भी हो गई पहले जैसे भाग-दौड़ भी नही कर पाने लगी । मुश्किलें पहले से ज्यादा बढ़ गई। फिर भी उसने खुद को संभाला और आगे अपने पढ़ाई को पूरा करने का फैसला किया । अब वापस से रामा अपने पढ़ाई में लग गई। इसी बीच उसकी दोनों छोटी बहनों की शादी भी हो गई , पर रमा सरकारी नौकरी पाने के लिए तैयारी में जुट गई और इस कारण पटना चली गई।

यही वो दौर था जब थोड़ी खुशियों के बौछार रमा के दामन में भी आए । 'विजय' नाम था उसका, जो रमा के सूने जीवन में बहार बन कर आया था , अब रमा को भी विजय का साथ अच्छा लगने लगा था । विजय रमा की हर छोटी से छोटी बातों का ध्यान रखता था । धीरे-धीरे रमा ने विजय को अपना सबकुछ मान लिया था । विजय ने रमा को भरोसा दिलाया की "मुझे तुम्हारे इस विकार से कोई फर्क नही पड़ता, मैं  तुमसे तुम्हारे इस विकार के साथ प्यार करता हूँ , और मैं तुम्हें अपनी पत्नी बनाना चाहता हूँ ।" रमा को मानो पंख लग आए हो और वो बस अपने इन पंखो के सहारे अपने सपनों के आसमान में स्वछ्न्द उड़ना चाह रही थी । विजय ने रमा से वादा किया कि जैसे ही मेरी नौकरी लगेगी मै अपने माता - पिता से हमारे रिश्ते कि बात करूँगा ।

आज विजय हाथ में मिठाई का डब्बा लिए रमा के पास पहुँच गया । " खट - खट, खट - खट, खट - खट" , "अरे बाबा आ रही हूँ, अब दरवाजा ही तोड़ दोगे क्या "कहती हुई जैसे ही रमा ने दरवाजा खोला, विजय ने उसे अपने बाहों मे भर लिया । " रमा - रमा, ओ मेरी प्यारी रमा,  मेरी नौकरी लग गई, रेलवे में ASM का पोस्ट है। ओ मेरी रमा,  आज मैं बहुत खुश हूँ । " इतना कहते हुए विजय ने मिठाई का टुकड़ा रमा के मुँह में भर दिया । आज रमा भी बहुत खुश थी । विजय और रमा इतने खुश थे कि सारी पाबन्दियों को भूलते हुए एक दूसरे में समाने से खुद को रोक न पाए, और विजय के प्यार के उस तूफान में  रमा खुद को बहने से न बचा पाई क्योंकि वो खुद भी इस समंदर में डूब जाना चाहती थी ।

दोनों एक दूजे के बांहों में लिपटे सो गए । तभी रमा के मोबाइल कि आवाज ने उसके नींद को तोड़ दिया, रमा ने मोबाइल देखा ' अरे ! भाभी का फोन ! ' "हाँ ! हेलो ! भाभी " रमा हड्बड़ाई आवाज में बोली । दूसरी तरफ से भाभी के रोने कि आवाज आ रही थी , और रोते हुए भाभी ने कहा  "रमा , तेरे भैया को दिल का दौरा आया है, तुम आज ही घर आ जाओ, हमें तुम्हारे भैया का बाइपास सर्जरी के लिए दिल्ली जाना होगा, घर पर बच्चे अकेले है, तुम आ जाओ बच्चों का ख्याल रखने" । "ठीक है भाभी, आज ही मैं निकलती हूँ,। " कह कर रमा ने फोन काट दिया । उसने विजय को बताया कि मुझे आज ही घर जाना होगा भैया कि तबीयत खराब है । विजय ने उसे दिलासा दिया कि,  तुम आराम से जाओ , मैं, हमारे रिश्ते के बारे में अपने माता-पिता को बता कर शादी के लिए राजी कर लूँगा । तुम भी जब भैया ठीक हो जाएगे तो घर में बता देना , तब तक के लिए मेरा हर प्यार हर एक पल के लिए तुम्हारे साथ ही तो है ।

रमा घर आ गई । भैया का ऑपरेशन भी सफल रहा । रमा घर और बच्चों कि भी ज़िम्मेदारी अच्छे से संभाल रही थी । आज वो अपने और विजय के बारे में भैया को बताना ही चाह रही थी कि उसका फोन बज उठा । विजय का ही फोन था , वो  खुशी से फोन उठा के बोली " अरे विजय ! कहाँ थे इतने दिनों से, तुम्हारा फोन ही नही लग रहा था । मैं भैया से हमारे बारे में बात करना चाह रही थी । "रमा" , विजय ने कहा , " सुनो तो सही मेरी बात , मेरी शादी हो गई, मेरे माता-पिता के पसंद कि लड़की से । मेरे माता - पिता हमारे रिश्ते के लिए राजी नहीं  हुए वो तुम्हारे इस विकार को स्वीकार नही कर सके , और मैं  मेरे माता - पिता के विरुद्ध नही जा सका ।" "रमा , हम अब भी पहले कि तरह मिल सकते है, सबकुछ वैसा ही रहेगा । "

रमा के तो पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गई और आंखो में आँसुओ का सैलाब उमड़ गया , उसके हाथ से फोन नीचे गिर पड़ा, और उसका 'विकार' उसके सामने खड़ा था ।
                                                                             
                                          ----- नीतू कुमारी  ✍️

Tuesday, May 12, 2020

ये तो सोचा न था...


यूं  मिल जाएगें हम दोनों एक दूजे से
ये तो सोचा न था,
अनजाने से दोस्त हो जाएगें हम
ये तो सोचा न था,
दोस्ती प्यार में बदल जाएगी
और रंग जाउंगी मैं, उसके प्यार में
ये तो सोचा न था।

प्यार का रंग यूं गहरा हो जाएगा
ये तो सोचा न था,
हम इस प्यार में  खो जाएगें
दुनियाँ तो क्या ,
खुद को ही बिसरायेगें ,
ये तो सोचा न था।

पर एक दिन  तुम रूठ जाओगें ,
ये तो सोचा न था,
प्यार में दगा दे जाओगे
ये तो सोचा न था,
हमें भुला कर , एक अजनबी बना कर
तुम किसी गैर के हो जाओगें ,
ये तो सोचा न था।
                         ----- नीतू कुमारी  ✍️


Monday, May 11, 2020

दूरियाँ

यूं दूरियाँ बर्दाश्त नहीं होती,
अब ये मजबूरियाँ बर्दाश्त नहीं होती,
बंद परिंदे सी जिंदगी हो गई है मेरी,
ये पाबंदियाँ बर्दाश्त नहीं होती।

तोड़ सारे बंधन,
उड़ जाने को जी करता है,
अगर कैद होना भी है तो,
आपके पलकों में कैद होने को जी करता है।

दिल में बस एक मलाल है,
की दूर हूँ आपसे,
पर दिल में एक सुकून है ,
की पास हूँ आपके।

यादों में ही सही ,
यादों की सौगातों में ही सही,
खुली पलकों के सामने ना सही,
बंद पलकों के आगोश तले ही सही। 
                                      ----- नीतू कुमारी  ✍️

एक लड़की का रिश्ता ...

जिंदगी में ऐसा मोड़ आया,
शादी का प्रस्ताव चारों ओर से आया....
पापा ने अपने दोस्त  के लड़के से बात चलाई,
मम्मी भी मेरिज ब्यूरो में पता लगाई।

मामा भी कहाँ  कम थे,
अगले दिन ही पहुँच गए लेकर एक रिश्ता,
कहा दीदी, लड़का ऊचे पोस्ट पर है ,...
लड़की का नसीब उच्च कोस्ट पर है।

जल्दी बात चलाओ,
कहीं रिश्ता हाथ से फिसल न जाये,
लड़की अभी तक तो अंदर है,
कहीं घर से निकल न जाये।

अगले दिन का हाल सुनो,  बुवा का पत्र आया....
पत्र जब मैंने खोला , दिल धक् से बोला,
इसमें भी लड़के का ही जिक्र है,
सबको मेरे रिश्ते की ही फ़िक्र  है।

कोई मुझ पर भी तो ध्यान करो,
मेरी मर्जी का तो सम्मान करो।
अभी करने तो मुझे आगे पढ़ाई ,
भले कुछ साल के बाद कर देना मेरी सगाई।।

                                            ----- नीतू कुमारी  ✍️


Saturday, May 9, 2020

तन्हाई




कब्र की मिट्टी उठा ले गया कोई,
इसी बहाने हमें छु गया कोई,
तनहाई और अंधेरे में खुश थे,
अब फिर इंतज़ार की वजह दे गया कोई। 



kabr ki mitti utha le gya koi,

isi bahane hame chhu gaya koi,

tanhai aur andhere me khush the,

ab fir intzar ki wazah de gya koi. 

मोहब्बत



दिल से कैसे निकले मोहब्बत आपकी ,
जबकि घर कर गई है दिल में सूरत आपकी.
क्या बताऊँ आपसे कितनी मोहब्बत है मगर ,
क्यों हमारे वास्ते है सिर्फ नफरत आपकी।



Dil se kese nikale mohbbat aapki, 

Jabki ghar kar gai hai dil  me surat aapki.

Kya batau aapse kitni mohbbat hai magar,

Kyu hmare waste hai sirf nafarat aapki.


Thursday, May 7, 2020

मैं औरत हूँ


मैं औरत हूँ......,  हाँ  मैं एक औरत हूँ ,

मैं बेटी हूँ , कोई अभिशाप नहीं
मैं बहन हूँ, कोई  संताप नहीं
मैं पत्नी हूँ, कोई पाप  नहीं
मैं एक माँ भी हूँ, कोई अनुताप  नहीं ।

औरत हूँ, पर लाचार नहीं,
कोमल हूँ, पर कमजोर नहीं,
मैं दुर्गा,  तो मैं ही काली हूँ,
मैं खुद में , खुद के लिए काफी हूँ।

नदियां भी मैं हूँ, सागर भी मैं हूँ,
आब भी मैं हूँ, और आग भी मैं हूँ ,
जरूरत नहीं मुझे किसी सहारे की,
जरूरत नही मुझे किसी किनारे की।

क्या समझ रखा है मुझे जमाने ने,
बस एक जाम , जो भरा है आपके पैमाने में,
दिल किया तो होठों  से लगा लिया ,
वरना  ठोकर मार दिया भरे मैखाने  में ।

मैं बेटी हूँ , मैं बहन हूँ,
प्रेमिका भी मैं हूँ, और पत्नी भी मैं ही हूँ,
मैं बहू किसी की, और माँ भी मैं ही हूँ,
पर सबसे पहले मैं एक औरत हूँ।

मैं औरत हूँ......,  हाँ  मैं एक औरत हूँ । ।
                                     ----- नीतू कुमारी  ✍️





Wednesday, May 6, 2020

वो खुश है ...

वो खुश है...
वो खुश है, बसा के अपनी दुनियाँ नई,
और तू क्यों फिरती है,
 बनी जैसे जोगन कोई ।

पल-पल, तिल-तिल जल रही है,
जल बिन जैसे मीन तड़प रही है।
हर पल है वो तेरी यादों में,
यादों में, तेरी साँसो में।

उसकी यादों में,
 नैनों से यूं नीर बहाया ना करो,
तुम खुद को सजा देकर,
 यूं रुलाया ना करो ।

की बेवफ़ाई तूने नही,
तूने तो वफा का रंग दिखाया,
बेवफा तो निकला वो,
जिसने कभी वफा ही नहीं निभाया।

तू सोच जरा तूने क्या खोया, क्या पाया ,
खोया तूने नहीं कुछ भी,
खोया तो उसने,
जिसने तुझे नहीं पाया।

देख जरा ये दुनिया बड़ी हसीन है,
फिर क्यों तेरी पलकें नमकीन है,
जबकि वो खुश है....
वो खुश है , बसा के अपनी दुनिया नई ।

                           ----- नीतू कुमारी  ✍️

Saturday, May 2, 2020

यादें


याद आती है आपकी बातें , वो हरकतें, वो शरारते,
याद आती है वो सारे हसीन पल जो बिताए थे संग आपके।

याद आती है वो पहली मुलाक़ात हमारी,
अजनबी से दोस्ती तक की दूरियाँ सारी।

न चाहते हुए भी याद आते हो आप,
याद में भी हमें छेड़ जाते हो आप।

इन यादों की सौगात को ले जाऊ कहाँ,
आपको याद न करू तो और जाऊ कहाँ ।

इन यादों को अपनी तकदीर बना लेगे हम,
दिल भूलना भी चाहे  तो याद दिला देगे हम।

ये यादें ही तो साथ है हमारे,
जिंदा हम है तो बस इन यादों के ही सहारें ।
                                               ----- नीतू कुमारी  ✍️