मेरे दिल के एहसास जो मेरे शब्दों के माध्यम से आपके दिल को छू लेने की खता कर रहे है ,❤️❤️❤️
Thursday, June 25, 2020
Wednesday, June 24, 2020
चाय और तुम...
जो रुठे-रुठे से
रहते हो तुम ,
यह दिल भी
डूबा-डूबा सा रहता है,
एक बार तो समझो
दिल की बेचैनियों को,
यह दिल हर वक्त
तुम्हें ही याद करता है।
आज भी तेरी याद में,
मैं चाय बनाया करता हूं,
एक प्याला खुद का तो
एक तेरे नाम का
पिया करता हूं।
हर एक चाय की
चुस्कियों में
तेरी बातें ढूंढा करता हूं,
तेरे होठों से छुए प्याले को
खुद के होठों पर
महसूस करता हूं।
तुम तो चाय सा
मीठा एहसास हो ,
तुम ही मेरी सरगम
तुम ही मेरी साज़ हो,
तेरी नाराजगी
मंजूर नहीं मुझे
तुम ही तो
मेरा आत्मविश्वास हो।
तेरी नाराजगी का
गुनहगार हूं मैं,
हर पल तेरे
इंतज़ार में बेकरार हूं मैं,
एक बार लौट आओ
मेरी जिंदगी में ,
तेरा वही बिछड़ा
हुआ प्यार हूं मैं ।
----- नीतु कुमारी✍️
Monday, June 22, 2020
अनकहे लम्हे
उनसे वो पहली मुलाकात
आज भी दिल को याद है,
कुछ अनकहे लम्हें
आज भी मेरे पास है।
पहली बार जब
मेरा हाथ था उनके हाथ में,
आज भी उस पर
उनके लबों की
गरमाहट का एहसास है।।
----- नीतु कुमारी✍️
Unse wo pehli mulakat
Aaj bhi Dil Ko yad hai,
Kuch ankahe Lamhe
Aaj bhi mere paas hai.
Pehli Baar jab
Mera hath tha unke hath mein
Aaj bhi us per
Unke labon ki
Garmahat ka ehsas hai.❤️
----Nitu Kumari✍️
Sunday, June 21, 2020
Happy Father's Day
मां की ममता को तो सब ने देखा,
पर पिता के त्याग को कोई देख ना पाया,
कड़ी धूप में खुद को तपाया,
बच्चों के खुशियों के लिए
अपना खून पसीना जलाया,
बच्चों की हर कही-अनकही
ख्वाहिशें पूरी करते करते ,
खुद की ख्वाहिशों को दफनाया ।
Happy fathers day
Maa ki Mamta ko to sab ne dekha,
Par Pita ke tyag ko koi dekh Na Paya,
Kadi dhup mein khud Ko tapaya,
Bacchon ke khushiyon ke liye
Apna khoon pasina Jalaya,
Bacchon ki har kahi-unkahi
Khwahishen Puri karte karte,
Khud ki khwahishon ko dafnaya.
Happy fathers day.
----- नीतु कुमारी✍️
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस
भागदौड़ भरी इस जिंदगी में
हर कोई बस भागा जा रहा है,
पर जाना कहां है ?
किसी ने सोचा है कि,
"स्वास्थ्य से बड़ा खजाना कहां है ?"
यदि रहना चाहो निरोग,
तो अपना लो योग।
जो नित दिन करे योग,
दूर रहे उससे कई रोग।।
Bhag Daud Bhari is jindagi mein
Har koi bus bhaga ja raha hai,
Per Jana Kahan hai?
Kisi ne socha hai ki
"Swasthya se bada khajana kahan hai?"
Yadi rahana chaho nirog,
To apna Lo Yoga
Dur rahe usse Kai Rog.
----- नीतु कुमारी✍️
Saturday, June 20, 2020
Friday, June 19, 2020
देशप्रेम
हिंदी, चीनी भाई-भाई
नेहरू के वक्त का था नारा,
हिंदी,चीनी बाय-बाय
करने का वक्त है हमारा।
छोटी-छोटी आँखों से
वह आँख हमें दिखाता है,
हमारी सीमा में घुसने का
दुस्साहस वो कर जाता है।
सीमा पर खड़े हैं
माँ भारती के शेर,
चुन-चुन कर जो
करते हैं दुश्मनों को ढेर।
जिस धरती ने दुनिया को
अहिंसा का पाठ पढ़ाया,
कभी भी दूसरों की सीमा में
अपना न हक जताया।
फिर क्यों पड़ोसी मुल्क
हर बार आँख दिखाता है,
कभी पाकिस्तान तो कभी चीन
हमसे लड़ने चला आता है।
हर बार हमारे वीरों ने
इन को हराया है ,
अपनी सीमा से
खदेड़ दूर भगाया है।
सीमा पर खड़े सैनिक तो
माँ भारती के लिए
अपनी जान देने को है तैयार ,
फिर हम आम नागरिक
क्यों न करें इन चीनियों
के भी बटुए पर वार।
हमने ही तो चीनियों के
बटुए को मजबूत बनाया है,
उनके दो कौड़ियों के समान को
अपने सर आँखों पर बिठाया है ।
अब इसका नतीजा
निकल कर सामने आ रहा,
हमारे खरीदे सामान के एवज में
आज हमारा वीर सैनिक
अपनी छाती पर गोलियां खा रहा।
हर एक गोली के पीछे
की हिस्सेदारी हमारी है,
अब देशप्रेम निभाने की बारी हमारी है।
कर बहिष्कार चीनियों के
सामान का उनकी अर्थव्यवस्था
को हमें हिलाना है,
सीमा पर तैनात सैनिकों का
हौसला भी हमें बढ़ाना है।
----- नीतु कुमारी✍️
Thursday, June 18, 2020
कंचन
जो हर सुबह
मेरी गलियों से
गुजरा करती थी,
हाथों में किताब
और आंखों में सपने
लिए घुमा करती थी,
हौसला था उसका कुछ
कर गुजरने का ,
पंख लगा ऊंची
उड़ान भरने का।
कच्ची उम्र में,
उसके हौसलों को
अपनों ने ही तोड़ दिया,
एक अधेड़ उम्र के
पुरुष से उसका
रिश्ता जोड़ दिया,
बहुत चिल्लाई,
बहुत गिड़गिड़ाई,
हाथ भी अपने जोड़ लिए ,
पर निष्ठुर थे
वो मां-बाप जो
बेटी को बोझ कह,
उसका पूर्ण जीवन
एक अधेड़ के
साथ झोक दिए।
वह शहनाई की
गूंज नहीं थी ,
वो तो था
एक शंखनाद
उसके नई जिंदगी
की लड़ाई का ,
पीछे छूट गया सपना
कंचन के पढ़ाई लिखाई का,
कंचन के पढ़ाई लिखाई का,
अब तो बस हर रात
कंचन काया तोड़ी जाती,
बिस्तर पर हर रात
कंचन की आत्मा निचोड़ी जाती ।
14 की उम्र में
गर्भधारण उसने कर लिया,
खुद की कोमल काया में
एक नन्हे जीवन
का भार सह लिया ,
फिर आई प्रसव पीड़ा की रात
पर इस पीड़ा को
वह ना झेल पाई,
आंखों में सपने लिए
कंचन कुछ ना बोल पाई,
मौन हो गई सदा के लिए वो
और मौन हो गए उसके सपने
काश उसके मां-बाप
हो पाते उसके अपने।
कंचन था नाम उसका
जो हर सुबह
मेरी गलियों से
गुजरा करती थी,
हाथों में किताब
और आंखों में सपने
लिए घुमा करती थी,
बस सपने लिए घुमा करती थी...
बस कुछ बेमाने सपने .....
----- नीतु कुमारी✍️
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